॥ अथ न्यासः ॥
अथ न्यासः सुनो।
ॐ अस्य श्री ललितासहस्रनामस्तोत्रमालामन्त्रस्य ।
अर्थ: यह मंत्र श्रीललिता सहस्रनाम स्तोत्र माला के लिए है।
वशिन्यादिवाग्देवता ऋषयः ।
अर्थ: ऋषि वशिन्यादि वाग्देवता हैं।
अनुष्टुप् छन्दः।
अर्थ: छन्द अनुष्टुप है।
श्रीललितापरमेश्वरी देवता ।
अर्थ: देवता श्रीललिता परमेश्वरी हैं।
श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम् ।
अर्थ: बीज मंत्र “श्रीमद्वाग्भवकूट” है।
मध्यकूटेति शक्तिः ।
अर्थ: मध्यकूट शक्ति है।
शक्तिकूटेति कीलकम् ।
अर्थ: शक्तिकूट कीलक है।
मूलप्रकृतिरिति ध्यानम् ।
अर्थ: ध्यान में मूल प्रकृति का ध्यान किया जाता है।
॥ अथ करन्यासः॥
अथ करन्यासः सुनो॥
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
अर्थ: अङ्गूठे को प्रणाम।
ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः ।
अर्थ: तर्जनी अंगुली को प्रणाम।
ॐ सौः मध्यमाभ्यां नमः ।
अर्थ: मध्यम अंगुली को प्रणाम।
ॐ सौः अनामिकाभ्यां नमः ।
अर्थ: अनामिका अंगुली को प्रणाम।
ॐ क्लीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
अर्थ: कनिष्ठिका अंगुली को प्रणाम।
ॐ ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
अर्थ: हाथ के तलवे और पृष्ठ भाग को प्रणाम।
॥ अथ अङ्गन्यासः॥
॥अथ अङ्गन्यासः सुनो॥
ॐ ऐं हृदयाय नमः ।
अर्थ: हृदय को प्रणाम।
ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा ।
अर्थ: शिर (सिर) को स्वाहा।
ॐ सौः शिखायै वषट् ।
अर्थ: शिखा को वषट्।
ॐ सौः कवचाय हुम् ।
अर्थ: शरीर के कवच को हुम्।
ॐ क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्।
अर्थ: तीनों नेत्रों को वौषट्।
ॐ ऐं अस्त्राय फट् ।
अर्थ: अस्त्र को फट्।
ॐ भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः।
अर्थ: भूमि, भुवन और स्वरोम की दिशाओं को दिग्बन्ध।
ॐ मम श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरीप्रसादसिद्धिद्वारा चिन्तितफलावात्यर्थे जपे विनियोगः ॥
अर्थ: मेरी जप साधना श्रीललिता महात्रिपुरसुन्दरी की कृपा और सिद्धि द्वारा फलदायक हो।
॥ अथ ध्यानम॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्, तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
अर्थ: जिनका शरीर सिन्दूर और लाल वर्ण का है, जिनकी आँखें तीन हैं, जिनके मुण्ड पर माणिक्य-मौली है, जिनके सिर पर तारानायक का मुकुट है और जिनका मुख स्मितमय है, तथा जिनके स्तन सुंदर हैं।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं, सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥१॥
अर्थ: जिनके हाथों में रत्नों से भरे कलश हैं, जो लाल कमल के समान हैं, जिनके पांव रत्न कलश पर स्थित हैं, ऐसे सौम्य रूप वाली परमम्बिका का ध्यान करना चाहिए।
अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम् ।
अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम् ॥२॥
अर्थ: जिनकी आँखें लाल और करुणा से तरंगित हैं, जिनके हाथों में पाश, अंकुश, पुष्प, बाण और धनुष हैं, जिनका शरीर अणिमा आदि गुणों से आच्छादित है, और जिनका स्वरुप किरणों से विभावित है, ऐसी भवानी का ध्यान करना चाहिए।
ध्यायेत्पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं, हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।
अर्थ: जो पद्मासन पर बैठी हैं, जिनका मुख विकसित और सुंदर है, जिनकी आँखें कमल के पत्तों के समान हैं, जिनकी चमड़ी सुनहरी है, पीले वस्त्र पहनें हैं, हाथ और तलवों पर सोने के कमल अंकित हैं, और शरीर सुंदरतम है, ऐसी वरांगिनी का ध्यान करना चाहिए।
सर्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं, श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ॥३॥
अर्थ: जो सभी आभूषणों से सुसज्जित हैं, जो सदा भयहीनता प्रदान करती हैं, जो भक्तों के प्रति नम्र हैं, जो श्रीविद्या की मूर्ति हैं, जो सभी देवताओं द्वारा पूजित हैं और जो सम्पूर्ण संपत्ति देने वाली हैं, ऐसी भवानी का ध्यान करना चाहिए।
सकुङ्कुमविलेपनामलिकचुम्बिकस्तूरिकां, समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम् ।
अर्थ: जिनका शरीर कुङ्कुम और मलिका से सुसज्जित है, जिनकी दृष्टि हंस की भांति है और जिनके हाथ में शर, चाप, पाश और अंकुश हैं, ऐसी भवानी का ध्यान करना चाहिए।
अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्यभूषाम्बरां, जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मरेदम्बिकाम् ॥४॥
अर्थ: जिनका वस्त्र और माला लाल और मोहिनी रूप से सज्जित है, जिनका शरीर जप के दौरान फूलों के प्रकाश के समान चमकता है, ऐसी भवानी को जप विधि में स्मरण करना चाहिए।
लमित्यादि पंचपूजां विभावयेत्
अर्थ: ‘लं’, ‘हं’, ‘यं’, ‘रं’, ‘वं’, ‘सं’ मंत्रों द्वारा पंचपूजा का ध्यान करना चाहिए।
‘लं’ पृथिवी तत्त्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै गन्धं परिकल्पयामि
अर्थ: ‘लं’ मंत्र के द्वारा पृथ्वी तत्त्व की देवी श्रीललिता को ध्यान करके उनके लिए सुगंध (अरोमा) का परिकल्पना करना चाहिए।
‘हं’ आकाश तत्त्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै पुष्पं परिकल्पयामि
अर्थ: ‘हं’ मंत्र के द्वारा आकाश तत्त्व की देवी श्रीललिता को ध्यान करके उनके लिए पुष्प अर्पित करने का परिकल्पना करना चाहिए।
‘यं’ वायु तत्त्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै धूपं परिकल्पयामि
अर्थ: ‘यं’ मंत्र के द्वारा वायु तत्त्व की देवी श्रीललिता को ध्यान करके उनके लिए धूप अर्पित करने का परिकल्पना करना चाहिए।
‘रं’ वह्नि तत्त्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै दीपं परिकल्पयामि
अर्थ: ‘रं’ मंत्र के द्वारा अग्नि/वह्नि तत्त्व की देवी श्रीललिता को ध्यान करके उनके लिए दीप अर्पित करने का परिकल्पना करना चाहिए।
‘वं’ अमृत तत्त्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै अमृतनैवेद्यं परिकल्पयामि
अर्थ: ‘वं’ मंत्र के द्वारा अमृत तत्त्व की देवी श्रीललिता को ध्यान करके उनके लिए अमृत नैवेद्य अर्पित करने का परिकल्पना करना चाहिए।
‘सं’ सर्वतत्त्वात्मिकायै श्रीललितादेव्यै ताम्बूलादि सर्वोपचारान् परिकल्पयामि
अर्थ: ‘सं’ मंत्र के द्वारा सभी तत्त्वों की देवी श्रीललिता को ध्यान करके उनके लिए ताम्बूलादि सभी प्रकार के औपचारिक पूजन (सम्पूर्ण पूजा सामग्री) का परिकल्पना करना चाहिए।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्रीमात्रे नमः
अर्थ: मैं श्रीमातृ (ललिता देवी) को नमस्कार करता हूँ।
ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी, श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी।
चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता, देवकार्य-समुद्यता ॥१॥
अर्थ: वह श्रीमाता, श्रीमहाराज्ञी और सिंहासन की अधिष्ठात्री हैं। वे चिद्-अग्नि-कुण्ड से उत्पन्न हुईं और सभी देवकार्य में रत हैं।
उद्यद्भानु सहस्राभा, चतुर्बाहु समन्विता।
रागस्वरूप पाशाढ्या, क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥२॥
अर्थ: उनका रूप उदयमान सूर्य के समान उज्ज्वल है, चार भुजाएँ हैं। वे राग रूपी पाशधारी हैं और क्रोध के रूप में अंगुशों से परिपूर्ण हैं।
मनोरूपेक्षुकोदण्डा, पञ्चतन्मात्र सायका।
निजारुण प्रभापूर मज्जद्-ब्रह्माण्डमण्डला ॥३॥
अर्थ: उनका मनोहर रूप धनुषाकार है, उनके पाँच तत्त्वों के शस्त्र हैं। उनका लाल प्रभामंडल पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ है।
चम्पकाशोक पुन्नाग सौगन्धिक लसत्कचा
कुरुविन्द मणिश्रेणी कनत्कोटीर मण्डिता ॥४॥
अर्थ: उनकी अलंकरणों में चम्पा, अशोक, पुन्नाग, सौगंधिक फूल, चमकदार कंचन, मणियों की श्रेणियाँ और कनक की कोटियाँ शामिल हैं।
अष्टमी चन्द्र विभ्राज दलिकस्थल शोभिता।
मुखचन्द्र कलङ्काभ मृगनाभि विशेषका ॥५॥
अर्थ: वे अष्टमी के चंद्रमा की तरह उज्ज्वल हैं, उनके मुख पर चंद्रमा का प्रकाश और मृगनाभि जैसी विशेषता है।
वदनस्मर माङ्गल्य गृहतोरण चिल्लिका।
वक्त्रलक्ष्मी परीवाह चलन्मीनाभ लोचना ॥६॥
अर्थ: उनके चेहरे में मंगल्य चिन्ह और गृह तोरण की शोभा है। उनके मुख के समीप लक्ष्मी का वास है, और आंखें चलती हुई मीनाभ की भांति हैं।
नवचम्पक पुष्पाभ नासादण्ड विराजिता।
ताराकान्ति तिरस्कारि नासाभरण भासुरा ॥७॥
अर्थ: उनके नासिका में नवचम्पक पुष्पों का अलंकरण है और ताराकार नासाभरण से उनका मुखाभरण सुशोभित है।
कदम्ब मञ्जरीकॢप्त कर्णपूर मनोहरा।
ताटङ्क युगलीभूत तपनोडुप मण्डला ॥८॥
अर्थ: उनके कान कदम्ब मञ्जरियों और कर्णपुंडलियों से अलंकृत हैं। ताटकों की जोड़ी से युक्त तपनोटुप मण्डल उनका श्रृंगार है।
पद्मराग शिलादर्श परिभावि कपोलभूः।
नवविद्रुम बिम्बश्रीः न्यक्कारि रदनच्छदा ॥९॥
अर्थ: उनके गालों का रंग कमल और शिला के दर्शन जैसा है। उनके गाल नवविद्रुम के बिम्बों जैसी शोभा रखते हैं।
शुद्ध विद्याङ्कुराकार द्विजपङ्क्ति द्वयोज्ज्वला।
कर्पूरवीटि कामोद समाकर्षद्दिगन्तरा ॥१०॥
अर्थ: उनके शुद्ध विद्याङ्कुर के समान दो पंक्तियों वाले दाँत हैं। कर्पूर की भांति सफेद और कामोद समाकर्षक हैं।
निजसल्लाप माधुर्य विनिर्भत्सित कच्छपी।
मन्दस्मित प्रभापूर मज्जत्-कामेश मानसा ॥११॥
अर्थ: उनकी वाणी में माधुर्य और सुकुमारता है। मंद स्मित से उनका प्रकट प्रभाव कामेश्वर को मोहित करता है।
अनाकलित सादृश्य चुबुक श्री विराजिता।
कामेशबद्ध माङ्गल्य सूत्रशोभित कन्थरा ॥१२॥
अर्थ: उनका रूप अनुपम और सादृश्यमय है। उनके कंठ में कामेश्वर द्वारा बांधा गया मंगल सूत्र शोभा प्रदान करता है।
कनकाङ्गद केयूर कमनीय भुजान्विता।
रत्नग्रैवेय चिन्ताक लोलमुक्ता फलान्विता ॥१३॥
अर्थ: उनके भुजाएँ सोने की अंगूठियों और कीयूरों से सज्जित हैं। मणियों से अलंकृत कमर और लोलित फलों जैसी शोभा है।
कामेश्वर प्रेमरत्न मणि प्रतिपणस्तनी।
नाभ्यालवाल रोमालि लताफल कुचद्वयी ॥१४॥
अर्थ: कामेश्वर का प्रेमरत्न उनके स्तनों पर स्थित है। नाभि से नीचे रोमालि लता के फल कुचयुक्त हैं।
लक्ष्यरोमलता धारता समुन्नेय मध्यमा।
स्तनभार दलन्-मध्य पट्टबन्ध वलित्रया ॥१५॥
अर्थ: वे लक्ष्यमय रोमों की मालाओं को धारण किए हैं। स्तनों का भार मध्यपट्टबंध से संतुलित है।
अरुणारुण कौसुम्भ वस्त्र भास्वत्-कटीतटी।
रत्नकिङ्किणि कारम्य रशनादाम भूषिता ॥१६॥
अर्थ: उनका वस्त्र अरुण और कौसुम्भ वर्ण का है। उनके गहनों में रत्नकिङ्किणियाँ और सुंदर रचनाएँ हैं।
कामेश ज्ञात सौभाग्य मार्दवोरु द्वयान्विता।
माणिक्य मकुटाकार जानुद्वय विराजिता ॥१७॥
अर्थ: कामेश्वर की कृपा से सौभाग्यशाली, दोमात्रिकाओं वाली, माणिक्य मुकुट जैसी जाँघाएँ सुशोभित हैं।
इन्द्रगोप परिक्षिप्त स्मर तूणाभ जङ्घिका।
गूढगुल्भा कूर्मपृष्ठ जयिष्णु प्रपदान्विता ॥१८॥
अर्थ: इन्द्रगोप के द्वारा स्मरणीय जाँघिकाएँ, गुप्त गुल्भा और कूर्मपृष्ठ जैसी शोभा से युक्त हैं।
नखदीधिति सञ्छन्न नमज्जन तमोगुणा।
पदद्वय प्रभाजाल पराकृत सरोरुहा ॥१९॥
अर्थ: उनके नख दीप्तिमान, तमोगुण से परिपूर्ण हैं। उनके पद-द्वय की शोभा पराक्रमी सरोरुहा जैसी है।
शिञ्जान मणिमञ्जीर मण्डित श्री पदाम्बुजा।
मराली मन्दगमना, महालावण्य शेवधिः ॥२०॥
अर्थ: उनके पदाम्बुज (पाँव) मणि-मञ्जीर से अलंकृत हैं। चलन में मंद गति और महान लावण्य से युक्त हैं।
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण भूषिता।
शिवकामेश्वराङ्कस्था, शिवा, स्वाधीन वल्लभा ॥२१॥
अर्थ: वे पूरे शरीर से अरुणाभ और सुशोभित हैं। शिवकामेश्वर के अंगों में स्थित, शिवा और स्वतंत्र प्रिय हैं।
सुमेरु मध्यशृङ्गस्था, श्रीमन्नगर नायिका।
चिन्तामणि गृहान्तस्था, पञ्चब्रह्मासनस्थिता ॥२२॥
अर्थ: वे सुमेरु के मध्य शिखर पर और श्रीनगर की नायिका हैं। चिन्तामणि गृह में स्थित और पाँच ब्रह्मासन पर विराजमान हैं।
महापद्माटवी संस्था, कदम्ब वनवासिनी।
सुधासागर मध्यस्था, कामाक्षी कामदायिनी ॥२३॥
अर्थ: वे महापद्म वन और कदम्ब वन की निवासी हैं। सुधासागर के मध्य स्थित, कामाक्षी और कामदायिनी हैं।
देवर्षि गणसङ्घात स्तूयमानात्म वैभवा।
भण्डासुर वधोद्युक्त शक्तिसेना समन्विता ॥२४॥
अर्थ: देवर्षियों और गणों द्वारा पूजित, उनका वैभव दिखाई देता है। वे भण्डासुर वध हेतु शक्तिसेनाओं से युक्त हैं।
सम्पत्करी समारूढ सिन्धुर व्रजसेविता।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्व कोटिकोटि भिरावृता ॥२५॥
अर्थ: वे सम्पदाओं को देने वाली हैं, सिन्धुर से सुसज्जित और व्रज सेवित हैं। अश्वारूढ़ होकर कोटिकोटि अश्वों द्वारा परिवृत हैं।
चक्रराज रथारूढ़ सर्वायुध परिष्कृता।
गेयचक्र रथारूढ़ मन्त्रिणी परिसेविता ॥२६॥
अर्थ: वे चक्रराज के रथ पर आरूढ़ हैं, सभी शस्त्र सज्जित हैं। मंत्रिणी के रूप में वे रथ पर सेवित हैं।
किरिचक्र रथारूढ़ दण्डनाथा पुरस्कृता।
ज्वालामालिनि काक्षिप्त वह्निप्राकार मध्यगा ॥२७॥
अर्थ: किरिचक्र रथ पर आरूढ़ दण्डनाथा द्वारा पूजित हैं। ज्वालामालाएँ उनके चारों ओर फैली हुई हैं और वे मध्य में स्थित हैं।
भण्डसैन्य वधोद्युक्त शक्ति विक्रमहर्षिता।
नित्या पराक्रमाटोप निरीक्षण समुत्सुका ॥२८॥
अर्थ: उनका सैन्य वध शक्ति द्वारा युक्त है, और वे नितांत पराक्रमी एवं विजयी हैं।
भण्डपुत्र वधोद्युक्त बालाविक्रम नन्दिता।
मन्त्रिण्यम्बा विरचित विषङ्ग वधतोषिता ॥२९॥
अर्थ: भण्डपुत्र का वध शक्तिशाली बालाविक्रम से सम्पन्न है। मंत्रिण्यां द्वारा रचित विषङ्ग से वह वध संतुष्ट है।
विशुक्र प्राणहरण वाराही वीर्यनन्दिता।
कामेश्वर मुखालोक कल्पित श्री गणेश्वरा ॥३०॥
अर्थ: विशुक्र वाराही प्राणहरण में वीर्यवान हैं। कामेश्वर के मुखालोक में श्री गणेश्वर कल्पित हैं।
महागणेश निर्भिन्न विघ्नयन्त्र प्रहर्षिता।
भण्डासुरेन्द्र निर्मुक्त शस्त्र प्रत्यस्त्र वर्षिणी ॥३१॥
अर्थ: महागणेश निर्भिन्न हैं और विघ्न यन्त्र से प्रहृष्ट हैं। भण्डासुरेन्द्र से मुक्त होकर वे शस्त्रों की वर्षा करते हैं।
कराङ्गुलि नखोत्पन्न नारायण दशाकृतिः।
महापाशुपतास्त्राग्नि निर्दग्धासुर सैनिका ॥३२॥
अर्थ: कराङ्गुलि से उत्पन्न नारायण दशाकृतियाँ हैं। महापाशुपतास्त्राग्नि से असुर सैनिक नष्ट हुए।
कामेश्वरास्त्र निर्दग्ध सभण्डासुर शून्यका।
ब्रह्मोपेन्द्र महेन्द्रादि देवसंस्तुत वैभवा ॥३३॥
अर्थ: कामेश्वरास्त्र से सभण्डासुर नष्ट हुआ। ब्रह्मा, इन्द्र और महेन्द्रादि देवता देवी के वैभव की स्तुति करते हैं।
हरनेत्राग्नि सन्दग्ध काम सञ्जीवनौषधिः।
श्रीमद्वाग्भव कूटैक स्वरूप मुखपङ्कजा ॥३४॥
अर्थ: हरनेत्राग्नि से काम संजीवन औषधि संजीवित होती है। श्रीमद्वाग्भव एक कूट में मुखपद्म रूप में प्रतिष्ठित हैं।
कण्ठाधः कटिपर्यन्त मध्यकूट स्वरूपिणी ।
शक्तिकूटैक तापन्न कट्यधोभाग धारिणी ॥३५॥
अर्थ: कण्ठ से कटि तक मध्यकूट रूप धारण करती हैं। शक्तिकूट में तापित होकर कटी एवं थल भाग की धारणा करती हैं।
मूलमन्त्रात्मिका, मूलकूट त्रय कलेबरा।
कुलामृतैक रसिका, कुलसङ्केत पालिनी ॥३६॥
अर्थ: मूलमन्त्रात्मिका हैं, मूलकूट के तीन कलेबर हैं। कुलामृत का रस प्रिय हैं और कुलसङ्केत की पालक हैं।
कुलाङ्गना, कुलान्तःस्था, कौलिनी, कुलयोगिनी।
अकुला, समयान्तःस्था, समयाचार तत्परा ॥३७॥
अर्थ: वे कुलाङ्गना और कुलान्तःस्था हैं। कौलिनी और कुलयोगिनी हैं। अकुला हैं, समयान्तःस्था हैं और समयाचार में तत्पर हैं।
मूलाधारैक निलया, ब्रह्मग्रन्थि विभेदिनी।
मणिपूरान्त रुदिता, विष्णुग्रन्थि विभेदिनी ॥३८॥
अर्थ: मूलाधार में निवास करती हैं और ब्रह्मग्रन्थि को विभेदित करती हैं। मणिपूरान्त में रुदित और विष्णुग्रन्थि को विभेदित करने वाली हैं।
आज्ञा चक्रान्तरालस्था, रुद्रग्रन्थि विभेदिनी।
सहस्राराम्बुजा रूढा, सुधासाराभि वर्षिणी ॥३९॥
अर्थ: आज्ञा चक्र के अंतराल में स्थित हैं, रुद्रग्रन्थि को विभेदित करती हैं। सहस्रार में प्रतिष्ठित हैं और सुधासार की वर्षा करती हैं।
तडिल्लता समरुचिः, षट्चक्रोपरि संस्थिता ।
महाशक्तिः कुण्डलिनी, बिसतन्तु तनीयसी॥४०॥
अर्थ: तटिल्लता समरुचि है, षट्-चक्र के ऊपर संस्थित हैं। महाशक्ति, कुण्डलिनी हैं और बिसतंतु की तरह तनी हुई हैं।
भवानी, भावनागम्या, भवारण्य कुठारिका।
भद्रप्रिया, भद्रमूर्ति, र्भक्तसौभाग्य दायिनी ॥४१॥
अर्थ: भवानी हैं, भावनागम्या हैं, भवारण्य की कुठारिका हैं। भद्रप्रिय और भद्रमूर्ति हैं, भक्तों को सौभाग्य प्रदान करती हैं।
भक्तिप्रिया, भक्तिगम्या, भक्तिवश्या, भयापहा।
शाम्भवी, शारदाराध्या, शर्वाणी, शर्मदायिनी ॥४२॥
अर्थ: भक्तिप्रिया और भक्तिगम्या हैं। भक्तिवश्या और भय निवारक हैं। शाम्भवी, शारदाराध्या और शर्वाणी हैं, शर्मदायिनी भी हैं।
शाङ्करी, श्रीकरी, साध्वी, शरच्चन्द्रनिभानना।
शातोदरी, शान्तिमती, निराधारा, निरञ्जना ॥४३॥
अर्थ: शाङ्करी, श्रीकरी और साध्वी हैं। शरच्चन्द्रनिभानना हैं। शातोदरी, शान्तिमती, निराधारा और निरञ्जना हैं।
निर्लेपा, निर्मला, नित्या, निराकारा, निराकुला।
निर्गुणा, निष्कला, शान्ता, निष्कामा, निरुपप्लवा ॥४४॥
अर्थ: वे निर्लेपा, निर्मला, नित्या, निराकारा और निराकुला हैं। निर्गुणा, निष्कला, शांत, निष्काम और निरुपप्लव हैं।
नित्यमुक्ता, निर्विकारा, निष्प्रपञ्चा, निराश्रया।
नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा, निरवद्या निरन्तरा ॥४५॥
अर्थ: वे नित्यमुक्ता, निर्विकारा, निष्प्रपञ्चा, निराश्रया हैं। नित्यशुद्धा, नित्यबुद्धा, निरवद्या और निरंतर हैं।
निष्कारणा, निष्कलङ्का, निरुपाधि, र्निरीश्वरा।
नीरागा, रागमथनी, निर्मदा, मदनाशिनी ॥४६॥
अर्थ: वे निष्कारणा, निष्कलङ्का, निरुपाधि और निरिश्वरी हैं। नीरागा, रागमथनी, निर्मदा और मदनाशिनी हैं।
निश्चिन्ता, निरहङ्कारा, निर्मोहा, मोहनाशिनी।
निर्ममा, ममताहन्त्री, निष्पापा, पापनाशिनी ॥४७॥
अर्थ: वे निश्चिन्ता, निरहंकारा, निर्मोहा और मोहनाशिनी हैं। निर्ममा, ममताहन्त्री, निष्पापा और पापनाशिनी हैं।
निष्क्रोधा, क्रोधशमनी, निर्लोभा, लोभनाशिनी।
निःसंशया, संशयघ्नी, निर्भवा, भवनाशिनी ॥४८॥
अर्थ: वे निष्क्रोधा, क्रोधशमनी, निर्लोभा और लोभनाशिनी हैं। निःसंदेह, संशयघ्नी, निर्भवा और भवनाशिनी हैं।
निर्विकल्पा, निराबाधा, निर्भेदा, भेदनाशिनी।
निर्नाशा, मृत्युमथनी, निष्क्रिया, निष्परिग्रहा ॥४९॥
अर्थ: वे निर्विकल्पा, निराबाधा, निर्भेदा और भेदनाशिनी हैं। निराशा, मृत्युमथनी, निष्क्रिया और निष्परिग्रहा हैं।
निस्तुला, नीलचिकुरा, निरपाया, निरत्यया।
दुर्लभा, दुर्गमा, दुर्गा, दुःखहन्त्री, सुखप्रदा ॥५०॥
अर्थ: वे निस्तुला, नीलचिकुरा, निरपाया और निरत्यया हैं। दुर्लभा, दुर्गमा, दुर्गा हैं, दुःखहन्त्री और सुखप्रदा भी हैं।
दुष्टदूरा, दुराचार शमनी, दोषवर्जिता।
सर्वज्ञा, सान्द्रकरुणा, समानाधिकवर्जिता ॥५१॥
अर्थ: हे माँ! आप दुष्टों से डरने वाली नहीं हैं, सभी दुराचारों को शांत करने वाली हैं और पूर्ण दोषमुक्त हैं। आप सर्वज्ञानी हैं और आपकी करुणा इतनी गहरी है कि सभी जीवों को समान दृष्टि और कृपा प्राप्त होती है।
सर्वशक्तिमयी, सर्वमङ्गला, सद्गतिप्रदा।
सर्वेश्वरी, सर्वमयी, सर्वमन्त्र स्वरूपिणी ॥५२॥
अर्थ: आप सम्पूर्ण शक्तिमयी हैं, सभी मंगलों की प्रदाता हैं और भक्तों को सद्गति देने वाली हैं। आप सर्वेश्वरी हैं, सबमें व्याप्त हैं और स्वयं सभी मंत्रों के स्वरूप हैं।
सर्वयन्त्रात्मिका, सर्वतन्त्ररूपा, मनोन्मनी।
माहेश्वरी, महादेवी, महालक्ष्मी, मृडप्रिय ॥५३॥
अर्थ: आप सभी यंत्रों की आत्मा हैं, सभी तंत्रों का रूप हैं और हृदय की मनोविनोदिनी हैं। आप माहेश्वरी, महादेवी, महालक्ष्मी हैं और अपने भक्तों के सुख और प्रेम में लीन रहती हैं।
महारूपा, महापूज्या, महापातक नाशिनी।
महामाया, महासत्त्वा, महाशक्ति, महारतिः ॥५४॥
अर्थ: आप विशाल रूप वाली हैं, परम पूज्य हैं, बड़े पापों का नाश करने वाली हैं। आप महामाया, महासत्त्वा और महाशक्ति हैं, जो अपने दिव्य रूप से सभी जीवों को मोहित कर देती हैं।
महाभोगा, महैश्वर्या, महावीर्या, महाबला।
महाबुद्धि, महासिद्धि, महायोगेश्वरेश्वरी ॥५५॥
अर्थ: हे भगवती! आप सम्पूर्ण भोगों की प्रदाता हैं, महैश्वर्य की अधिष्ठात्री, महावीर्य और महाबला हैं। आपकी महाबुद्धि, महासिद्धि और महायोगेश्वरी शक्ति से सब कुछ संभव है।
महातन्त्रा, महामन्त्र, महायन्त्रा, महासना।
महायाग क्रमाराध्या, महाभैरव पूजिता ॥५६॥
अर्थ: आप महा तंत्र, महा मंत्र, महायंत्र और महासना की आराध्य हैं। आप महायाग के क्रम में पूजित हैं और महाभैरव को प्रसन्न करती हैं।
महेश्वर, महाकल्प, महाताण्डव साक्षिणी।
महाकामेश, महिषी, महात्रिपुरसुन्दरी ॥५७॥
अर्थ: आप महेश्वर की शक्तियों की साक्षी हैं, महाकल्प की समर्थक और महाताण्डव की निरीक्षिका हैं। आप महाकामेश की पत्नी, महिषी और महात्रिपुरसुंदरी के रूप में जगत में प्रकट हैं।
चतुःषष्ट्युपचाराढ्या, चतुःषष्टि कलामयी ।
महाचतुःषष्टिकोटि, योगिनी गणसेविता ॥५८॥
अर्थ: आप ६४ प्रकार के उपचारों से पूज्य हैं और ६४ कलाओं की अधिष्ठात्री हैं। आप ६४ कोटि योगिनी गणों द्वारा सेवा की जाने वाली महामाता हैं।
मनुविद्या, चन्द्रविद्या, चन्द्रमण्डलमध्यगा।
चारुरूपा, चारुहासा, चारुचन्द्र कलाधरा ॥५९॥
अर्थ: आप मनु विद्या और चन्द्र विद्या की अधिष्ठात्री हैं। चन्द्रमण्डल में स्थिर, सुंदर रूप और मधुर हास्य वाली आप चारुचन्द्र की तरह चमकती हैं।
चराचर जगन्नाथा, चक्रराज निकेतना।
पार्वती, पद्मनयना, पद्मराग समप्रभा ॥६०॥
अर्थ: आप चराचर जगत की अधिष्ठात्री हैं, चक्रराज की निवासिनी हैं। आप पार्वती हैं, आपके नेत्र कमल समान हैं और आपके लाल रंग में पूर्ण पद्मराग की छटा छायी हुई है।
पञ्चप्रेतासनासीना, पञ्चब्रह्म स्वरूपिणी।
चिन्मयी, परमानन्दा, विज्ञान घनरूपिणी ॥६१॥
अर्थ: आप पाँच प्रेतासनाओं में स्थित हैं और पाँच ब्रह्म स्वरूपिणी हैं। आप चिन्मयी हैं, परम आनंद की रूपधारिणी और विज्ञान के घन के रूप में जगत में प्रकट हैं।
ध्यानध्यातृ ध्येयरूपा, धर्माधर्म विवर्जिता।
विश्वरूपा, जागरिणी, स्वपन्ती, तैजसात्मिका ॥६२॥
अर्थ: आप ध्यान के माध्यम से ध्यान की प्राप्ति कराने वाली हैं। आप धर्म-अधर्म से परे हैं, विश्व रूपा हैं, जाग्रत और स्वप्न रूप से सदा जीवित हैं और तेजस्विता की प्रकृति वाली हैं।
सुप्ता, प्राज्ञात्मिका, तुर्या, सर्वावस्था विवर्जिता।
सृष्टिकर्त्री, ब्रह्मरूपा, गोप्त्री, गोविन्दरूपिणी ॥६३॥
अर्थ: आप सुप्त अवस्था, प्राज्ञात्मा और तुरीय अवस्था की अधिष्ठात्री हैं। आप सृष्टिकर्ता, ब्रह्मरूपिणी, संरक्षण करने वाली और गोविन्द रूप वाली हैं।
संहारिणी, रुद्ररूपा, तिरोधानकरीश्वरी।
सदाशिवानुग्रहदा, पञ्चकृत्य परायणा ॥६४॥
अर्थ: आप जगत के संहार की अधिष्ठात्री हैं, रुद्र रूपा हैं और अंधकार का नाश करने वाली हैं। आप सदाशिव की कृपा देने वाली हैं और पाँच कृत्यों (सृजन, पालन, संहार, अवतार, उपासना) में पूर्ण निपुण हैं।
भानुमण्डल मध्यस्था, भैरवी, भगमालिनी।
पद्मासना, भगवती, पद्मनाभ सहोदरी ॥६५॥
अर्थ: आप भानुमंडल के मध्य में स्थित हैं, भैरवी और भगमालिनी हैं। आप पद्मासन में विराजमान भगवती हैं और भगवान पद्मनाभ की सहोदरी हैं।
उन्मेष निमिषोत्पन्न विपन्न भुवनावलिः।
सहस्रशीर्षवदना, सहस्राक्षी, सहस्रपात् ॥६६॥
अर्थ: आपका दृष्टि रूप इतना दिव्य है कि जैसे अनंत विश्व आपका आभारी है। आपके चेहरे के हज़ार मुख, हज़ार नेत्र और हज़ार पैर हैं, जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशमान कर रहे हैं।
आब्रह्म कीटजननी, वर्णाश्रम विधायिनी।
निजाज्ञारूपनिगमा, पुण्यापुण्य फलप्रदा ॥६७॥
अर्थ: आप सभी जीवों की माता हैं, वर्ण और आश्रम की विधायिका हैं। आपकी आज्ञा रूपी निर्देशिका से सब कुछ नियन्त्रित है और आप पुण्य-अपुण्य के फल देने वाली हैं।
श्रुति सीमन्त सिन्धूरीकृत पादाब्जधूलिका।
सकलागम सन्दोह शुक्तिसम्पुट मौक्तिका ॥६८॥
अर्थ: आपके पादकमलों पर श्रुति और सीमाओं की सिंदूरी धूलि है। आप सभी आगमों का संधान करती हैं और शुक्ति-मौक्तिकाओं से सुसज्जित हैं।
पुरुषार्थप्रदा, पूर्णा, भोगिनी, भुवनेश्वरी।
अम्बिका,ऽनादि निधना, हरिब्रह्मेन्द्र सेविता ॥६९॥
अर्थ: आप सभी पुरुषार्थों की प्रदाता, पूर्णा और भोगिनी हैं। आप भुवनेश्वरी, अम्बिका, अनादि निधाना हैं और हरि और ब्रह्मा की सेविका हैं।
नारायणी, नादरूपा, नामरूप विवर्जिता।
ह्रीङ्कारी, ह्रीमती, हृद्या, हेयोपादेय वर्जिता ॥७०॥
अर्थ: आप नारायणी हैं, नाद रूप में और नाम रूप से परे हैं। आप ह्रीँकारिणी, ह्रीमती, हृदय की आत्मा हैं और केवल उपासनीय हैं।
राजराजार्चिता, राज्ञी, रम्या, राजीवलोचना।
रञ्जनी, रमणी, रस्या, रणत्किङ्किणि मेखला ॥७१॥
अर्थ: आप राजराजार्चिता हैं, राज्ञी हैं, रमणीय हैं और राजीवलोचन जैसी सुंदरता हैं। आप रञ्जनी, रमणी, रस्या हैं और रणत्किङ्किणि की माला जैसी भव्य हैं।
रमा, राकेन्दुवदना, रतिरूपा, रतिप्रिया।
रक्षाकरी, राक्षसघ्नी, रामा, रमणलम्पटा ॥७२॥
अर्थ: आप रमा हैं, राकेन्दुवदना हैं, रति रूपा और रति की प्रिय हैं। आप राक्षसों को नष्ट करने वाली हैं और रमणीय प्रेम में लीन हैं।
काम्या, कामकलारूपा, कदम्ब कुसुमप्रिया।
कल्याणी, जगतीकन्दा, करुणारस सागरा ॥७३॥
अर्थ: आप काम्या हैं, काम कला की रूपधारिणी हैं, कदम्ब के पुष्पों की प्रिय हैं। आप कल्याणी, जगती की कन्दा और करुणा के सागर हैं।
कलावती, कलालापा, कान्ता, कादम्बरीप्रिया।
वरदा, वामनयना, वारुणीमदविह्वला ॥७४॥
अर्थ: हे माँ! आप कलाओं की रानी हैं, कलालापिनी हैं, सुंदर कान्ता हैं और कदम्ब के पुष्पों जैसी प्रिय हैं। आप वरदान देने वाली हैं, वामनेत्रिणी हैं और जल की ऊर्जा से मदमस्त हैं।
विश्वाधिका, वेदवेद्या, विन्ध्याचल निवासिनी।
विधात्री, वेदजननी, विष्णुमाया, विलासिनी ॥७५॥
अर्थ: आप सम्पूर्ण जगत की अधिष्ठात्री हैं, वेदों की ज्ञाता और विन्ध्याचल में निवास करने वाली हैं। आप विधात्री हैं, वेदों की जननी हैं, विष्णु माया की रूपधारिणी हैं और सदा खेल-क्रीड़ा करती हैं।
क्षेत्रस्वरूपा, क्षेत्रेशी, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ पालिनी।
क्षयवृद्धि विनिर्मुक्ता, क्षेत्रपाल समर्चिता ॥७६॥
अर्थ: आप क्षेत्र की आत्मा हैं, क्षेत्र की अधिष्ठात्री और क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ की रक्षक हैं। आप नाश और वृद्धि से परे हैं और क्षेत्रपाल द्वारा सम्मानित हैं।
विजया, विमला, वन्द्या, वन्दारु जनवत्सला।
वाग्वादिनी, वामकेशी, वह्निमण्डल वासिनी ॥७७॥
अर्थ: आप विजयी हैं, निर्मल हैं, वंदनीय हैं और भक्तों पर स्नेह रखने वाली हैं। आप वाणी की अधिष्ठात्री हैं, वाम नेत्रिणी हैं और अग्निमंडल में निवास करती हैं।
भक्तिमत्-कल्पलतिका, पशुपाश विमोचनी।
संहृताशेष पाषण्डा, सदाचार प्रवर्तिका ॥७८॥
अर्थ: आप भक्तों के हृदय में कल्याण की कल्पलता की तरह प्रकट होती हैं। आप पशुपाशों से मुक्त करने वाली हैं, सभी पाषण्डों का संहार करने वाली हैं और सदाचार की स्थापना करने वाली हैं।
तापत्रयाग्नि सन्तप्त समाह्लादन चन्द्रिका।
तरुणी, तापसाराध्या, तनुमध्या, तमोऽपहा ॥७९॥
अर्थ: आप ताप और त्रिविध अग्नि से तपे हुए को शीतलता देने वाली चन्द्रिका हैं। आप तरुणी हैं, तपस्वियों की आराध्या, मध्यम काया वाली और तमो नाशक हैं।
चिति, स्तत्पदलक्ष्यार्था, चिदेक रसरूपिणी।
स्वात्मानन्दलवीभूत ब्रह्माद्यानन्द सन्ततिः ॥८०॥
अर्थ: आप चित्त हैं, पदों के अध्ययन का उद्देश्य हैं और चिद्रस का स्वरूप हैं। आप स्वात्मानंद की लता की तरह हैं, ब्रह्मा और अन्य आनंदों की संतान हैं।
परा, प्रत्यक्चिती रूपा, पश्यन्ती, परदेवता।
मध्यमा, वैखरीरूपा, भक्तमानस हंसिका ॥८१॥
अर्थ: आप परा हैं, प्रत्यक्ष चित्त रूपा हैं, परदेवता को देखने वाली हैं। आप मध्यमा हैं, वैखरीरूपा हैं और भक्तों के मानस में हंस की तरह प्रकट होती हैं।
कामेश्वर प्राणनाडी, कृतज्ञा, कामपूजिता।
शृङ्गार रससम्पूर्णा, जया, जालन्धरस्थिता ॥८२॥
अर्थ: आप कामेश्वर की प्राणनाड़ी हैं, कृतज्ञा हैं और काम के पूजन की आराध्या हैं। आप श्रृंगार रस से पूर्ण हैं, जया हैं और जालन्धर में विराजमान हैं।
ओड्याण पीठनिलया, बिन्दुमण्डल वासिनी।
रहोयाग क्रमाराध्या, रहस्तर्पण तर्पिता ॥८३॥
अर्थ: आप ओड्याण पीठ में निवास करती हैं, बिन्दुमंडल की अधिष्ठात्री हैं। आप रहोयाग के क्रम से पूज्य हैं और रहस्तर्पण द्वारा तृप्त होती हैं।
सद्यः प्रसादिनी, विश्वसाक्षिणी, साक्षिवर्जिता।
षडङ्गदेवता युक्ता, षाड्गुण्य परिपूरिता ॥८४॥
अर्थ: आप तुरंत प्रसन्न होने वाली हैं, सम्पूर्ण जगत की साक्षी हैं और किसी भी साक्ष्य पर निर्भर नहीं हैं। आप षडंग देवताओं से युक्त हैं और षाड्गुण्य से पूर्ण हैं।
नित्यक्लिन्ना, निरुपमा, निर्वाण सुखदायिनी।
नित्या, षोडशिकारूपा, श्रीकण्ठार्ध शरीरिणी ॥८५॥
अर्थ: आप सदा क्लिन्न हैं, अद्वितीय हैं और निर्वाण सुख देने वाली हैं। आप नित्य हैं, १६ आकारों की अधिष्ठात्री हैं और श्रीकण्ठार्ध शरीर वाली हैं।
प्रभावती, प्रभारूपा, प्रसिद्धा, परमेश्वरी।
मूलप्रकृति रव्यक्ता, व्यक्ताऽव्यक्त स्वरूपिणी ॥८६॥
अर्थ: आप प्रभावी हैं, प्रभारी रूपा हैं, प्रसिद्ध हैं और परमेश्वरी हैं। आप मूल प्रकृति के रव्यक्त रूप हैं और व्यक्त-अव्यक्त स्वरूप की धारण करने वाली हैं।
व्यापिनी, विविधाकारा, विद्याऽविद्या स्वरूपिणी।
महाकामेश नयना कुमुदाह्लाद कौमुदी ॥८७॥
अर्थ: आप सर्वत्र व्यापी हैं, विविध आकार की हैं, विद्या-अविद्या स्वरूपा हैं। आप महाकामेश की नेत्रधारिणी हैं और कमल जैसी आलोकमयी हैं।
भक्तहार्द तमोभेद भानुमद्-भानुसन्ततिः।
शिवदूती, शिवाराध्या, शिवमूर्ति, शिवङ्करी ॥८८॥
अर्थ: आप भक्तों के हृदय की तमोवृत्ति नाशक हैं, भानुमत्-भानु संतति की तरह उज्ज्वल हैं। आप शिव की दूत हैं, शिवाराध्य हैं, शिवमूर्ति हैं और शिवङ्करी हैं।
शिवप्रिया, शिवपरा, शिष्टेष्टा, शिष्टपूजिता।
अप्रमेया, स्वप्रकाशा, मनोवाचाम गोचरा ॥८९॥
अर्थ: आप शिव की प्रिय हैं, शिव से परा हैं, शिष्टों की ईष्टा हैं और शिष्टों द्वारा पूजित हैं। आप असीमित हैं, अपने प्रकाश में हैं और मन और वाणी से अनुभव की जाने योग्य हैं।
चिच्छक्ति, श्चेतनारूपा, जडशक्ति, जडात्मिका।
गायत्री, व्याहृति, स्सन्ध्या, द्विजबृन्द निषेविता ॥९०॥
अर्थ: आप चिच्छक्ति हैं, चेतना के रूप में हैं, जड़ शक्ति और जड़ात्मा की प्रकृति वाली हैं। आप गायत्री, व्याहृति और संध्या रूपा हैं, और द्विजजनों द्वारा सेवा की जाने वाली हैं।
तत्त्वासना, तत्त्वमयी, पञ्चकोशान्तरस्थिता।
निस्सीममहिमा, नित्ययौवना, मदशालिनी ॥९१॥
अर्थ: हे माँ! आप तत्त्व का आसन हैं, तत्त्वमयी हैं और पंचकोशों के अंतर में निवास करती हैं। आपकी महिमा अनंत है, आप हमेशा युवा हैं और मदमस्त, सजीव और खेल-क्रीड़ा में लीन रहती हैं।
मदघूर्णित रक्ताक्षी, मदपाटल गण्डभूः।
चन्दन द्रवदिग्धाङ्गी, चाम्पेय कुसुम प्रिया ॥९२॥
अर्थ: आपकी नेत्र लाल रक्त से भरे हैं, गाल मद की तरह उज्ज्वल हैं। आपके शरीर पर चन्दन की रसीली लेपनियाँ हैं और आप चाम्पक के पुष्पों जैसी प्रिय हैं।
कुशला, कोमलाकारा, कुरुकुल्ला, कुलेश्वरी।
कुलकुण्डालया, कौल मार्गतत्पर सेविता ॥९३॥
अर्थ: आप कुशल हैं, कोमल आकार की हैं, परिवार की गौरवशाली हैं और कुल की अधिष्ठात्री हैं। आप कुंडालों से सुशोभित हैं और कौल मार्ग में समर्पित सेवा करती हैं।
कुमार गणनाथाम्बा, तुष्टिः, पुष्टि, र्मति, र्धृतिः।
शान्तिः, स्वस्तिमती, कान्ति, र्नन्दिनी, विघ्ननाशिनी ॥९४॥
अर्थ: आप कुमार गणनाथ की माता हैं, संतुष्टि, पुष्टता, बुद्धि और धृति देने वाली हैं। आप शांति, कल्याण, कान्ति और आनंद देने वाली हैं, तथा सभी विघ्नों का नाश करती हैं।
तेजोवती, त्रिनयना, लोलाक्षी कामरूपिणी।
मालिनी, हंसिनी, माता, मलयाचल वासिनी ॥९५॥
अर्थ: आप तेजस्विनी हैं, त्रिनयना हैं, लोलाक्षी और काम रूपधारिणी हैं। आप मालाओं से सजित हैं, हंस की तरह कोमल हैं, माता हैं और मलयाचल में निवास करती हैं।
सुमुखी, नलिनी, सुभ्रूः, शोभना, सुरनायिका।
कालकण्ठी, कान्तिमती, क्षोभिणी, सूक्ष्मरूपिणी ॥९६॥
अर्थ: आप सुमुखी हैं, कमलिनी हैं, उज्ज्वल भौंहों वाली हैं, शोभायुक्त हैं और देवों की नायिका हैं। आप कालकण्ठी हैं, कान्तिमती हैं, क्षोभजनक हैं और सूक्ष्म रूपधारिणी हैं।
वज्रेश्वरी, वामदेवी, वयोऽवस्था विवर्जिता।
सिद्धेश्वरी, सिद्धविद्या, सिद्धमाता, यशस्विनी ॥९७॥
अर्थ: आप वज्रेश्वरी हैं, वामदेवी हैं और उम्र की बंधन-रहित हैं। आप सिद्धों की अधिष्ठात्री, सिद्ध विद्या की माता, सिद्धमाता हैं और यशस्विनी हैं।
विशुद्धि चक्रनिलया,ऽऽरक्तवर्णा, त्रिलोचना।
खट्वाङ्गादि प्रहरणा, वदनैक समन्विता ॥९८॥
अर्थ: आप विशुद्धि चक्र में निवास करती हैं, रक्तवर्णा हैं, त्रिनयना हैं। आप खट्वांग आदि अस्त्रों से युक्त हैं और आपका मुख एकता में संलग्न है।
पायसान्नप्रिया, त्वक्स्था, पशुलोक भयङ्करी।
अमृतादि महाशक्ति संवृता, डाकिनीश्वरी ॥९९॥
अर्थ: आप केवल पायस से प्रिय नहीं हैं, त्वकस्थ हैं और पशुलोक में भय उत्पन्न करने वाली हैं। आप अमृतादि महाशक्ति से आच्छादित हैं और डाकिनीश्वरी हैं।
अनाहताब्ज निलया, श्यामाभा, वदनद्वया।
दंष्ट्रोज्ज्वला,ऽक्षमालाधिधरा, रुधिर संस्थिता ॥१००॥
अर्थ: आप अनाहत के पद में निवास करती हैं, श्यामाभा हैं और आपके दो मुख हैं। आपकी दाँतों से अग्नि उभरती है, नेत्रों में माला धारण है और रक्त से सम्पन्न हैं।
कालरात्र्यादि शक्त्योघवृता, स्निग्धौदनप्रिया।
महावीरेन्द्र वरदा, राकिण्यम्बा स्वरूपिणी ॥१०१॥
अर्थ: हे माता! आप कालरात्रि और अन्य शक्तियों से घिरी हुई हैं, आपका शरीर कोमल और सजीव है। आप महान वीरों की वरदायिनी हैं और राक्षसों पर विजय करने वाली स्वरूपिणी हैं।
मणिपूराब्ज निलया, वदनत्रय संयुता।
वज्राधिकायुधोपेता, डामर्यादिभि रावृता ॥१०२॥
अर्थ: आप मणिपूर में निवास करती हैं, आपके तीन मुख हैं। आप वज्र और अन्य अस्त्रों से युक्त हैं और डमरु आदि से सजित हैं।
रक्तवर्णा, मांसनिष्ठा, गुडान्न प्रीतमानसा।
समस्त भक्तसुखदा, लाकिन्यम्बा स्वरूपिणी ॥१०३॥
अर्थ: आप रक्तवर्णा हैं, मांस-भोजन की प्रिय हैं, और गुड़-धान्य खाने वाली मनःस्थिति से युक्त हैं। आप सभी भक्तों को सुख देने वाली हैं और लाकिन्यम्बा स्वरूपिणी हैं।
स्वाधिष्ठानाम्बु जगता, चतुर्वक्त्र मनोहरा।
शूलाद्यायुध सम्पन्ना, पीतवर्णा,ऽतिगर्विता ॥१०४॥
अर्थ: आप स्वाधिष्ठान चक्र में निवास करती हैं, चार मुख सुंदर हैं। आप शूल और अन्य अस्त्रों से युक्त हैं, पीतवर्णा हैं और अत्यंत गर्वित हैं।
मेदोनिष्ठा, मधुप्रीता, बन्दिन्यादि समन्विता।
दध्यन्नासक्त हृदया, काकिनी रूपधारिणी ॥१०५॥
अर्थ: आप मस्तिष्क में स्थित हैं, मधु की प्रिय हैं और बंधनों में स्थित शक्ति का रूप धारण करती हैं। आपका हृदय दधि में आसक्त है और आप काकिनी स्वरूपिणी हैं।
मूला धाराम्बुजारूढा, पञ्चवक्त्रा,ऽस्थिसंस्थिता।
अङ्कुशादि प्रहरणा, वरदादि निषेविता ॥१०६॥
अर्थ: आप मूला धारा पर स्थित हैं, पांच मुख और हड्डियों से युक्त हैं। आप अङ्कुश आदि से युक्त हैं और वरदान देने वाली हैं।
मुद्गौदनासक्त चित्ता, साकिन्यम्बास्वरूपिणी।
आज्ञा चक्राब्जनिलया, शुक्लवर्णा, षडानना ॥१०७॥
अर्थ: आपका चित्त मुद्ग और अनाज में आसक्त है। आप साकिन्यम्बा स्वरूपिणी हैं, आज्ञा चक्र में निवास करती हैं, शुक्लवर्णा और छः मुख वाली हैं।
मज्जासंस्था, हंसवती मुख्यशक्ति समन्विता।
हरिद्रान्नैक रसिका, हाकिनी रूपधारिणी ॥१०८॥
अर्थ: आप मस्तिष्क में स्थित हैं, हंसवती और प्रमुख शक्ति से युक्त हैं। आप केवल हरिद्रान्न में रसिक हैं और हाकिनी स्वरूप धारण करती हैं।
सहस्रदल पद्मस्था, सर्ववर्णोप शोभिता।
सर्वायुधधरा, शुक्ल संस्थिता, सर्वतोमुखी ॥१०९॥
अर्थ: आप सहस्रदल वाले कमल पर स्थित हैं, सभी वर्णों से अलंकृत हैं। आप सभी अस्त्रों से युक्त हैं, शुक्लवर्णा हैं और सर्वतोमुखी हैं।
सर्वौदन प्रीतचित्ता, याकिन्यम्बा स्वरूपिणी।
स्वाहा, स्वधा,ऽमति, र्मेधा, श्रुतिः, स्मृति, रणुत्तमा ॥११०॥
अर्थ: आपका हृदय सभी भोजन में आनन्दित है। आप याकिन्यम्बा स्वरूपिणी हैं। आप स्वाहा, स्वधा, अमति, मेधा, श्रुति, स्मृति और रण में श्रेष्ठ हैं।
पुण्यकीर्तिः, पुण्यलभ्या, पुण्यश्रवण कीर्तना।
पुलोमजार्चिता, बन्धमोचनी, बन्धुरालका ॥१११॥
अर्थ: आप पुण्य की कीर्ति, पुण्य प्राप्त करने वाली और पुण्यश्रवण कीर्तन करने वाली हैं। आप पुलोमजा द्वारा पूजित हैं, बंधनमोचन हैं और बंधुरालका स्वरूपिणी हैं।
विमर्शरूपिणी, विद्या, वियदादि जगत्प्रसूः।
सर्वव्याधि प्रशमनी, सर्वमृत्यु निवारिणी ॥११२॥
अर्थ: आप विमर्शस्वरूपिणी हैं, विद्या और जगत की उत्पत्ति देने वाली हैं। आप सभी रोगों का निवारण करती हैं और सभी मृत्युओं से रक्षा करती हैं।
अग्रगण्या,ऽचिन्त्यरूपा, कलिकल्मष नाशिनी।
कात्यायिनी, कालहन्त्री, कमलाक्ष निषेविता ॥११३॥
अर्थ: आप अग्रणी हैं, अद्भुत और कलि के पापों का नाश करने वाली हैं। आप कात्यायिनी हैं, समय की संहारक और कमलाक्षा हैं।
ताम्बूल पूरित मुखी, दाडिमी कुसुमप्रभा।
मृगाक्षी, मोहिनी, मुख्या, मृडानी, मित्ररूपिणी ॥११४॥
अर्थ: आपका मुख ताम्बूल से भरा है, दाडिमी और पुष्पों जैसी प्रभा है। आपकी दृष्टि मृग की तरह है, मोहिनी हैं, प्रमुख हैं, मृडानी हैं और मित्ररूपिणी हैं।
नित्यतृप्ता, भक्तनिधि, र्नियन्त्री, निखिलेश्वरी।
मैत्र्यादि वासनालभ्या, महाप्रलय साक्षिणी ॥११५॥
अर्थ: आप हमेशा तृप्त हैं, भक्तों की निधि हैं, सबकी नियंत्री हैं और सर्वेश्वरी हैं। आप मैत्र्यादि इच्छाओं से परे हैं और महाप्रलय की साक्षी हैं।
पराशक्तिः, परानिष्ठा, प्रज्ञान घनरूपिणी।
माध्वीपानालसा, मत्ता, मातृका वर्ण रूपिणी ॥११६॥
अर्थ: आप पराशक्ति हैं, परम निष्ठावान हैं, प्रज्ञान घन रूपधारी हैं। आप माध्वीपान में अलसी नहीं हैं, मत्त हैं और मातृका वर्णधारी हैं।
महाकैलास निलया, मृणाल मृदुदोर्लता।
महनीया, दयामूर्ती, र्महासाम्राज्यशालिनी ॥११७॥
अर्थ: आप महाकैलास में निवास करती हैं, कमल और मृदु बेलों जैसी हैं। आप महान हैं, दयामूर्ति हैं और महान साम्राज्य की शालिनी हैं।
आत्मविद्या, महाविद्या, श्रीविद्या, कामसेविता।
श्रीषोडशाक्षरी विद्या, त्रिकूटा, कामकोटिका ॥११८॥
अर्थ: आप आत्मविद्या, महाविद्या और श्रीविद्या में समर्थ हैं, काम को सेवा करती हैं। आप श्रीषोडशाक्षरी विद्या में सिद्ध हैं, त्रिकूट और कामकोटिका हैं।
कटाक्षकिङ्करी भूत कमला कोटिसेविता।
शिरःस्थिता, चन्द्रनिभा, फालस्थेन्द्र धनुःप्रभा ॥११९॥
अर्थ: आप कटाक्ष करने वाली, भूत कमला की कोटि-सेविता हैं। आप शिर में स्थित हैं, चंद्र जैसी हैं और फालस्थेन्द्र धनु प्रभा जैसी हैं।
हृदयस्था, रविप्रख्या, त्रिकोणान्तर दीपिका।
दाक्षायणी, दैत्यहन्त्री, दक्षयज्ञ विनाशिनी ॥१२०॥
अर्थ: आप हृदय में स्थित हैं, सूर्य जैसी प्रकाशित हैं, त्रिकोणों के बीच दीपक हैं। आप दाक्षायणी हैं, दैत्यों की संहारक और दक्षयज्ञ विनाशिनी हैं।
दरान्दोलित दीर्घाक्षी, दरहासोज्ज्वलन्मुखी।
गुरुमूर्ति, र्गुणनिधि, र्गोमाता, गुहजन्मभूः ॥१२१॥
अर्थ: आपकी लंबी आंखें हैं जो भावों से हिलती हैं, हँसी से प्रकाशित मुख है। आप गुरु स्वरूप हैं, गुणों की निधि हैं, गोमाता हैं और गुप्त जन्म की धारणकर्ता हैं।
देवेशी, दण्डनीतिस्था, दहराकाश रूपिणी।
प्रतिपन्मुख्य राकान्त तिथिमण्डल पूजिता ॥१२२॥
अर्थ: आप देवों की अधिष्ठात्री हैं, दंड और नीति में स्थित हैं, आकाश में स्वरूप धारण करती हैं। आप प्रतिपन्मुख्य पूजित हैं।
कलात्मिका, कलानाथा, काव्यालाप विनोदिनी।
सचामर रमावाणी सव्यदक्षिण सेविता ॥१२३॥
अर्थ: आप कलाओं की आत्मा हैं, कलानाथा हैं और काव्यालाप विनोदिनी हैं। आप सचामर और रमावाणी में सेविता हैं।
आदिशक्ति, रमेया,ऽऽत्मा, परमा, पावनाकृतिः।
अनेककोटि ब्रह्माण्ड जननी, दिव्यविग्रहा ॥१२४॥
अर्थ: आप आदिशक्ति हैं, रमणीय हैं, आत्मा हैं, परम हैं और पवित्र कृति की धारणकर्ता हैं। आप अनेक ब्रह्माण्डों की जननी हैं और दिव्य शरीर धारण करती हैं।
क्लीङ्कारी, केवला, गुह्या, कैवल्य पददायिनी।
त्रिपुरा, त्रिजगद्वन्द्या, त्रिमूर्ति, स्त्रिदशेश्वरी ॥१२५॥
अर्थ: आप क्लीङ्कारी हैं, केवला हैं, गुप्त हैं और कैवल्य देने वाली हैं। आप त्रिपुरा हैं, त्रिजगद्वन्द्या हैं, त्रिमूर्ति हैं और स्त्रिदशेश्वरी हैं।
त्र्यक्षरी, दिव्यगन्धाढ्या, सिन्धूर तिलकाञ्चिता।
उमा, शैलेन्द्रतनया, गौरी, गन्धर्व सेविता ॥१२६॥
अर्थ: आप त्र्यक्षरी हैं, दिव्य गंध से परिपूर्ण हैं, सिंदूर-तिलक वाली हैं। आप उमा हैं, पर्वतपुत्री हैं, गौरी हैं और गन्धर्वों की सेविता हैं।
विश्वगर्भा, स्वर्णगर्भा,ऽवरदा वागधीश्वरी।
ध्यानगम्या,ऽपरिच्छेद्या, ज्ञानदा, ज्ञानविग्रहा ॥१२७॥
अर्थ: आप विश्वगर्भा हैं, स्वर्णगर्भा हैं, वरदान देने वाली वागधीश्वरी हैं। आप ध्यानगम्या हैं, अपरिच्छेद्या हैं, ज्ञान देने वाली और ज्ञानविग्रह हैं।
सर्ववेदान्त संवेद्या, सत्यानन्द स्वरूपिणी।
लोपामुद्रार्चिता, लीलाकॢप्त ब्रह्माण्डमण्डला ॥१२८॥
अर्थ: आप सर्व वेदांत की ज्ञाता हैं, सत्यानन्द स्वरूपिणी हैं। आप लोपामुद्रा द्वारा पूजित हैं और ब्रह्माण्डमण्डल में लीला-कृत हैं।
अदृश्या, दृश्यरहिता, विज्ञात्री, वेद्यवर्जिता।
योगिनी, योगदा, योग्या, योगानन्दा, युगन्धरा ॥१२९॥
अर्थ: आप अदृश्य हैं, दृश्यरहित हैं, ज्ञात्री हैं और वेद्यों से परे हैं। आप योगिनी हैं, योग देने वाली, योग्य और योगानंद देने वाली, युगन्धरा हैं।
इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति क्रियाशक्ति स्वरूपिणी।
सर्वाधारा, सुप्रतिष्ठा, सदसद्-रूपधारिणी ॥१३०॥
अर्थ: आप इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति हैं। आप सभी की आधार हैं, सुस्थापित हैं और सदसद् रूप धारण करती हैं।
अष्टमूर्ति, रजाजैत्री, लोकयात्रा विधायिनी।
एकाकिनी, भूमरूपा, निर्द्वैता, द्वैतवर्जिता ॥१३१॥
अर्थ: आप अष्टमूर्ति हैं, रजाजैत्री हैं, लोकयात्रा करने वाली हैं। आप एकाकिनी हैं, भूमि रूपा हैं, अद्वैत हैं और द्वैत से परे हैं।
अन्नदा, वसुदा, वृद्धा, ब्रह्मात्मैक्य स्वरूपिणी।
बृहती, ब्राह्मणी, ब्राह्मी, ब्रह्मानन्दा, बलिप्रिया ॥१३२॥
अर्थ: आप अन्न देने वाली, वसुधा जैसी, वृद्ध हैं और ब्रह्म-आत्मैक्य स्वरूपिणी हैं। आप बृहती हैं, ब्राह्मणी हैं, ब्राह्मी हैं, ब्रह्मानंद हैं और बलिप्रिया हैं।
भाषारूपा, बृहत्सेना, भावाभाव विवर्जिता।
सुखाराध्या, शुभकरी, शोभना सुलभागतिः ॥१३३॥
अर्थ: आप भाषारूपा हैं, बड़ी सेना जैसी हैं, भाव और अभाव से परे हैं। आप सुखाराध्या हैं, शुभकरी हैं, शोभना और सुलभ भाग्य देने वाली हैं।
राजराजेश्वरी, राज्यदायिनी, राज्यवल्लभा।
राजत्-कृपा, राजपीठ निवेशित निजाश्रिताः ॥१३४॥
अर्थ: आप राजराजेश्वरी हैं, राज्य देने वाली और राज्यवल्लभा हैं। आपके कृपा से, आपके राजपीठ पर निवास करने वाले आश्रित हैं।
राज्यलक्ष्मीः, कोशनाथा, चतुरङ्ग बलेश्वरी।
साम्राज्यदायिनी, सत्यसन्धा, सागरमेखला ॥१३५॥
अर्थ: आप राज्यलक्ष्मी हैं, कोशनाथा हैं, चतुरंग युद्धबल से युक्त हैं। आप साम्राज्य देने वाली, सत्यसंधा और सागर-मेखला जैसी हैं।
दीक्षिता, दैत्यशमनी, सर्वलोक वशङ्करी।
सर्वार्थदात्री, सावित्री, सच्चिदानन्द रूपिणी ॥१३६॥
अर्थ: आप दीक्षित हैं, दैत्य और पापियों का संहार करने वाली हैं, और समस्त लोकों को अपने प्रेम और कृपा से वश में करने वाली हैं। आप सर्वार्थदाता, सावित्री और सच्चिदानंद स्वरूपिणी हैं।
देशकालाऽपरिच्छिन्ना, सर्वगा, सर्वमोहिनी।
सरस्वती, शास्त्रमयी, गुहाम्बा, गुह्यरूपिणी ॥१३७॥
अर्थ: आप समय और स्थान से परे हैं, सर्वांगसुंदर और मोहिनी स्वरूपिणी हैं। आप सरस्वती, शास्त्रसम्पन्न और गुह्यरूपिणी हैं।
सर्वोपाधि विनिर्मुक्ता, सदाशिव पतिव्रता।
सम्प्रदायेश्वरी, साध्वी, गुरुमण्डल रूपिणी ॥१३८॥
अर्थ: आप सभी बाधाओं और उपाधियों से मुक्त हैं। सदाशिव की प्रियतम पतिव्रता स्वरूपा, सम्प्रदायों की अधिष्ठात्री, साध्वी और गुरु मण्डल की रूपिणी हैं।
कुलोत्तीर्णा, भगाराध्या, माया, मधुमती, मही।
गणाम्बा, गुह्यकाराध्या, कोमलाङ्गी, गुरुप्रिया ॥१३९॥
अर्थ: आप कुलों की उन्नति करने वाली, भगवान् की प्रियतमा, माया और मधुमती हैं। गणों की अधिष्ठात्री, रहस्यों की आराध्या, कोमलांगिनी और गुरुओं की प्रिय हैं।
स्वतन्त्रा, सर्वतन्त्रेशी, दक्षिणामूर्ति रूपिणी।
सनकादि समाराध्या, शिवज्ञान प्रदायिनी ॥१४०॥
अर्थ: आप स्वतंत्र हैं, सभी तंत्रों की अधिष्ठात्री और दक्षिणामूर्ति स्वरूपिणी हैं। आप सनकादि ऋषियों की आराध्या और शिवज्ञान देने वाली हैं।
चित्कला,ऽनन्दकलिका, प्रेमरूपा, प्रियङ्करी।
नामपारायण प्रीता, नन्दिविद्या, नटेश्वरी ॥१४१॥
अर्थ: आप चेतना और आनंद की कलिका हैं, प्रेम रूपिणी और प्रिय करने वाली हैं। आप नामपाठ में आनंद लेने वाली, नन्दी की विद्या में निपुण और नाट्य की अधिष्ठात्री हैं।
मिथ्या जगदधिष्ठाना मुक्तिदा, मुक्तिरूपिणी।
लास्यप्रिया, लयकरी, लज्जा, रम्भादि वन्दिता ॥१४२॥
अर्थ: आप मिथ्या जगत की अधिष्ठात्री नहीं हैं, बल्कि मोक्ष देने वाली और मोक्षस्वरूपिणी हैं। आप लास्य प्रिय हैं, लय करने वाली, शील और लज्जा की प्रतिमूर्ति हैं और रंभा आदि दैवीय नृत्यांगनाओं द्वारा पूजित हैं।
भवदाव सुधावृष्टिः, पापारण्य दवानला।
दौर्भाग्यतूल वातूला, जराध्वान्त रविप्रभा ॥१४३॥
अर्थ: आप संसार में अमृत जैसी वर्षा देने वाली हैं, और पाप के जंगल को जला देने वाली अग्नि हैं। आप दुर्भाग्य को दूर करने वाली, समय की गति को नियंत्रित करने वाली और वृद्धावस्था और मृत्यु के अन्धकार को समाप्त करने वाली हैं।
भाग्याब्धिचन्द्रिका, भक्तचित्तकेकि घनाघना।
रोगपर्वत दम्भोलि, मृत्युदारु कुठारिका ॥१४४॥
अर्थ: आप भाग्य के सागर में चंद्रिका जैसी हैं और भक्तों के हृदय में घनघोर प्रकाश फैलाने वाली हैं। आप रोगों के पर्वत को नष्ट करने वाली, दंभोलियों को संहारने वाली और मृत्यु को समाप्त करने वाली हैं।
महेश्वरी, महाकाली, महाग्रासा, महाऽशना।
अपर्णा, चण्डिका, चण्डमुण्डाऽसुर निषूदिनी ॥१४५॥
अर्थ: आप महेश्वरी, महाकाली, महाग्रासी और महाअन्न भक्षक हैं। आप अपर्णा हैं, चण्डिका हैं और चण्डमुण्ड और असुरों को नष्ट करने वाली हैं।
क्षराक्षरात्मिका, सर्वलोकेशी, विश्वधारिणी।
त्रिवर्गदात्री, सुभगा, त्र्यम्बका, त्रिगुणात्मिका ॥१४६॥
अर्थ: आप क्षर और अक्षर की मूलधारा हैं, सभी लोकों में वास करने वाली और विश्व की आधारधारिणी हैं। आप त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) देने वाली, सौभाग्यकारी, त्र्यम्बक और त्रिगुणात्मा हैं।
स्वर्गापवर्गदा, शुद्धा, जपापुष्प निभाकृतिः।
ओजोवती, द्युतिधरा, यज्ञरूपा, प्रियव्रता ॥१४७॥
अर्थ: आप स्वर्ग और मोक्ष देने वाली, शुद्ध और जप के पुष्पों जैसी हैं। आप ऊर्जा और तेजस्विनी हैं, यज्ञ स्वरूपा और प्रियव्रता हैं।
दुराराध्या, दुरादर्षा, पाटली कुसुमप्रिया।
महती, मेरुनिलया, मन्दार कुसुमप्रिया ॥१४८॥
अर्थ: आप कठिनाई से अराध्य नहीं होने वाली, दूरदर्शी, पाटली और मन्दार के फूल जैसी प्रिय हैं। आप महती और मेरु पर्वत में निवास करने वाली हैं।
वीराराध्या, विराड्रूपा, विरजा, विश्वतोमुखी।
प्रत्यग्रूपा, पराकाशा, प्राणदा, प्राणरूपिणी ॥१४९॥
अर्थ: आप वीरों की आराध्य, विराट रूपिणी, निर्विकार और सर्वमुखी हैं। आप प्रत्यक्ष रूपिणी, सर्वव्यापक और प्राण देने वाली हैं।
मार्ताण्ड भैरवाराध्या, मन्त्रिणी न्यस्तराज्यधूः।
त्रिपुरेशी, जयत्सेना, निस्त्रैगुण्या, परापरा ॥१५०॥
अर्थ: आप सूर्य जैसी भैरव की आराध्य, मंत्रिणी और राज्य के अधिकार से युक्त हैं। आप त्रिपुरेशी, जीतशाली सेना की अधिष्ठात्री, त्रिगुण से परे और परम सर्वोच्च हैं।
सत्यज्ञानाऽनन्दरूपा, सामरस्य परायणा।
कपर्दिनी, कलामाला, कामधुक्,कामरूपिणी ॥१५१॥
अर्थ: आप सत्यज्ञान और आनन्दस्वरूप हैं, सामरस्य में लीन। आप कपर्दिनी, कलाओं की माला, कामधेनु और कामरूपिणी हैं।
कलानिधिः, काव्यकला, रसज्ञा, रसशेवधिः।
पुष्टा, पुरातना, पूज्या, पुष्करा, पुष्करेक्षणा ॥१५२॥
अर्थ: आप कलाओं का भंडार, काव्यकला में निपुण, रस का ज्ञान रखने वाली और रस की सेवा करने वाली हैं। आप पुष्ट, प्राचीन, पूज्य, पुष्कर स्वरूपा और पुष्कर नेत्रधारी हैं।
परञ्ज्योतिः, परन्धाम, परमाणुः, परात्परा।
पाशहस्ता, पाशहन्त्री, परमन्त्र विभेदिनी ॥१५३॥
अर्थ: आप परमार्ग का प्रकाश, परम निवास, परमाणु और परम सर्वोच्च हैं। आप पाशधारी, पाशहन्त्री और परम मंत्रों का भेद बताने वाली हैं।
मूर्ता,ऽमूर्ता,ऽनित्यतृप्ता, मुनि मानस हंसिका।
सत्यव्रता, सत्यरूपा, सर्वान्तर्यमिनी, सती ॥१५४॥
अर्थ: आप मूर्त और अमूर्त, नित्यतृप्त और मुनियों के हृदय की हंसिका हैं। आप सत्यव्रता, सत्यरूपिणी, सर्वव्यापी और सती हैं।
ब्रह्माणी, ब्रह्मजननी, बहुरूपा, बुधार्चिता।
प्रसवित्री, प्रचण्डाऽज्ञा, प्रतिष्ठा, प्रकटाकृतिः ॥१५५॥
अर्थ: आप ब्रह्मा, ब्रह्मा की जननी, बहुरूपा और बुधों की आराध्य हैं। आप प्रसव देने वाली, प्रचंड ज्ञान वाली, प्रतिष्ठा और प्रकट स्वरूपिणी हैं।
प्राणेश्वरी, प्राणदात्री, पञ्चाशत्-पीठरूपिणी।
विशृङ्खला, विविक्तस्था, वीरमाता, वियत्प्रसूः ॥१५६॥
अर्थ: आप प्राण की अधिष्ठात्री, प्राण देने वाली और पचास पीठों जैसी हैं। आप श्रृंखलाओं वाली, विविक्त और वीर मातृस्वरूपिणी हैं।
मुकुन्दा, मुक्ति निलया, मूलविग्रह रूपिणी।
भावज्ञा, भवरोगघ्नी, भवचक्र प्रवर्तिनी ॥१५७॥
अर्थ: आप मुकुंद हैं, मुक्ति का निवास और मूल रूपधारिणी हैं। आप भावज्ञानिणी, भवरोग नाशक और भवचक्र प्रवर्तक हैं।
छन्दस्सारा, शास्त्रसारा, मन्त्रसारा, तलोदरी।
उदारकीर्ति, रुद्दामवैभवा, वर्णरूपिणी ॥१५८॥
अर्थ: आप छंद, शास्त्र और मन्त्र का सार हैं, तलोदरी हैं। आप उदारकीर्ति वाली, रुद्र वैभव की धारण करने वाली और वर्णस्वरूपिणी हैं।
जन्ममृत्यु जरातप्त जन विश्रान्ति दायिनी।
सर्वोपनिष दुद्घुष्टा, शान्त्यतीत कलात्मिका ॥१५९॥
अर्थ: आप जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था से पीड़ित जीवों को विश्रांति देने वाली हैं। आप सभी उपनिषदों की सारस्वरूपा और शांति-परासिद्ध हैं।
गम्भीरा, गगनान्तःस्था, गर्विता, गानलोलुपा।
कल्पनारहिता, काष्ठा, कान्ता, कान्तार्ध विग्रहा ॥१६०॥
अर्थ: आप गम्भीर, आकाश के भीतर निवास करने वाली, गर्वित और गीत में रुचि रखने वाली हैं। आप कल्पना रहित, स्थिर, सुन्दर और आधा कान्त रूपधारिणी हैं।
कार्यकारण निर्मुक्ता, कामकेलि तरङ्गिता।
कनत्-कनकताटङ्का, लीलाविग्रह धारिणी ॥१६१॥
अर्थ: आप कारण और परिणाम से मुक्त हैं, कामक्रीड़ा में तरंगित हैं। आप सोने जैसी अलंकारिक और लीलाविग्रह धारण करने वाली हैं।
अजाक्षय विनिर्मुक्ता, मुग्धा क्षिप्रप्रसादिनी।
अन्तर्मुख समाराध्या, बहिर्मुख सुदुर्लभा ॥१६२॥
अर्थ: आप अजर-अक्षय हैं, किसी बंधन से मुक्त, भोली और शीघ्र प्रसाद देने वाली हैं। आप अंतर्मुख आराध्या और बहिर्मुख दुर्लभ हैं।
त्रयी, त्रिवर्ग निलया, त्रिस्था, त्रिपुरमालिनी।
निरामया, निरालम्बा, स्वात्मारामा, सुधासृतिः ॥१६३॥
अर्थ: आप त्रयी, त्रिवर्ग की अधिष्ठात्री, त्रिस्था और त्रिपुर माला धारण करने वाली हैं। आप निरामय, निरालंब, स्वात्माराम और सुधा जैसी प्रवाहित हैं।
संसारपङ्क निर्मग्न समुद्धरण पण्डिता।
यज्ञप्रिया, यज्ञकर्त्री, यजमान स्वरूपिणी ॥१६४॥
अर्थ: आप संसार की गंदगी में डूबी आत्माओं को उद्धार करने वाली पंडिता हैं। आप यज्ञप्रिय, यज्ञ करने वाली और यजमान स्वरूपिणी हैं।
धर्माधारा, धनाध्यक्षा, धनधान्य विवर्धिनी।
विप्रप्रिया, विप्ररूपा, विश्वभ्रमण कारिणी ॥१६५॥
अर्थ: आप धर्म की आधारधारिणी, धन की अधिष्ठात्री और धन व अन्न बढ़ाने वाली हैं। आप ब्राह्मणप्रिय, ब्राह्मण रूपधारिणी और विश्व भ्रमण करने वाली हैं।
विश्वग्रासा, विद्रुमाभा, वैष्णवी, विष्णुरूपिणी।
अयोनि, र्योनिनिलया, कूटस्था, कुलरूपिणी ॥१६६॥
अर्थ: आप विश्व को ग्रहण करने वाली, विद्रुमाभा जैसी, वैष्णवी और विष्णु रूपिणी हैं। आप अयोनि, र्योनि में निवास करने वाली, कूटस्थ और कुल स्वरूपिणी हैं।
वीरगोष्ठीप्रिया, वीरा, नैष्कर्म्या, नादरूपिणी।
विज्ञान कलना, कल्या विदग्धा, बैन्दवासना ॥१६७॥
अर्थ: आप वीरों की गोष्ठी प्रिय हैं, वीर, निष्कर्मा और नाद स्वरूपिणी हैं। आप विज्ञान की कलना, कल्याणकारी विदग्धा और बैन्दव के गुणों वाली हैं।
तत्त्वाधिका, तत्त्वमयी, तत्त्वमर्थ स्वरूपिणी।
सामगानप्रिया, सौम्या, सदाशिव कुटुम्बिनी ॥१६८॥
अर्थ: आप तत्त्वों में अधिक हैं, तत्त्वमयी और तत्त्वार्थ स्वरूपिणी हैं। आप सामगान प्रिय, सौम्य और सदाशिव परिवार की सुसंस्कारिणी हैं।
सव्यापसव्य मार्गस्था, सर्वापद्वि निवारिणी।
स्वस्था, स्वभावमधुरा, धीरा, धीर समर्चिता ॥१६९॥
अर्थ: आप दायें-बाएँ मार्ग में स्थायी, सभी विपदाओं को निवारिणी हैं। आप स्वस्थित, मधुर स्वभाव वाली, धीरी और धीरों द्वारा पूज्य हैं।
चैतन्यार्घ्य समाराध्या, चैतन्य कुसुमप्रिया।
सदोदिता, सदातुष्टा, तरुणादित्य पाटला ॥१७०॥
अर्थ: आप चैतन्य को अर्घ्य देने वाली, चैतन्य के फूल प्रिय हैं। आप सदोदित, सदैव तुष्ट, और तरुण सूर्य जैसी पाटला हैं।
दक्षिणा, दक्षिणाराध्या, दरस्मेर मुखाम्बुजा।
कौलिनी केवलाऽनर्घ्या कैवल्य पददायिनी ॥१७१॥
अर्थ: आप दक्षिणा हैं, दक्षिण की आराध्या और दर्शन करने पर मन को आनंद देने वाली हैं। आप कौलिनी, अनमोल और केवल्य (मोक्ष) पद देने वाली हैं।
स्तोत्रप्रिया, स्तुतिमती, श्रुतिसंस्तुत वैभवा।
मनस्विनी, मानवती, महेशी, मङ्गलाकृतिः ॥१७२॥
अर्थ: आप स्तोत्र-प्रिय हैं, स्तुति से भरी हुई और श्रुति द्वारा स्तुत वैभव वाली हैं। आप मनस्विनी, मानवता में प्रतिष्ठित, महेशी और मंगलकारी हैं।
विश्वमाता, जगद्धात्री, विशालाक्षी, विरागिणी।
प्रगल्भा, परमोदारा, परामोदा, मनोमयी ॥१७३॥
अर्थ: आप विश्वमाता, जगत की धात्री, विशाल नेत्रों वाली और विरागिनी हैं। आप प्रगल्भा, परम आनंद देने वाली, परामोदा और मनोमयी हैं।
व्योमकेशी, विमानस्था, वज्रिणी, वामकेश्वरी।
पञ्चयज्ञप्रिया, पञ्चप्रेत मञ्चाधिशायिनी ॥१७४॥
अर्थ: आप व्योमकेशी और विमान में निवास करने वाली हैं। आप वज्रिणी, वामकेश्वरी, पाँच यज्ञों की प्रिय और पाँच प्रेतों के मंच की अधिष्ठात्री हैं।
पञ्चमी, पञ्चभूतेशी, पञ्च सङ्ख्योपचारिणी।
शाश्वती, शाश्वतैश्वर्या, शर्मदा, शम्भुमोहिनी ॥१७५॥
अर्थ: आप पञ्चमी हैं, पाँच भूतों की अधिष्ठात्री और पाँच संख्याओं से संबंधित हैं। आप शाश्वती, शाश्वत ऐश्वर्य वाली, शर्मदा और शम्भु को मोहने वाली हैं।
धरा, धरसुता, धन्या, धर्मिणी, धर्मवर्धिनी।
लोकातीता, गुणातीता, सर्वातीता, शमात्मिका ॥१७६॥
अर्थ: आप धरा हैं, धरसुता, धन्य और धर्मिणी हैं। आप धर्म को बढ़ाने वाली, लोक, गुण और सर्वत्र से परे हैं, और शमात्मिका हैं।
बन्धूक कुसुम प्रख्या, बाला, लीलाविनोदिनी।
सुमङ्गली, सुखकरी, सुवेषाड्या, सुवासिनी ॥१७७॥
अर्थ: आप बन्धूक कुसुम जैसी प्रकाशित, बाल रूपा और लीला में मनोरंजन करने वाली हैं। आप शुभमयी, सुख देने वाली, सुशोभित और सुगंधिनी हैं।
सुवासिन्यर्चनप्रीता, शोभना, शुद्ध मानसा।
बिन्दु तर्पण सन्तुष्टा, पूर्वजा, त्रिपुराम्बिका ॥१७८॥
अर्थ: आप सुवासिनी हैं, आराधना में प्रिय, शोभित और शुद्ध मन वाली हैं। आप बिन्दु तर्पण से संतुष्ट, पूर्वजों की आराध्य और त्रिपुराम्बिका हैं।
दशमुद्रा समाराध्या, त्रिपुरा श्रीवशङ्करी।
ज्ञानमुद्रा, ज्ञानगम्या, ज्ञानज्ञेय स्वरूपिणी ॥१७९॥
अर्थ: आप दस मुद्राओं से आराध्य, त्रिपुरा और श्रीशङ्करी हैं। आप ज्ञान मुद्रा वाली, ज्ञान प्राप्त करने योग्य और ज्ञानज्ञेय स्वरूपिणी हैं।
योनिमुद्रा, त्रिखण्डेशी, त्रिगुणाम्बा, त्रिकोणगा।
अनघाद्भुत चारित्रा, वाञ्छितार्थ प्रदायिनी ॥१८०॥
अर्थ: आप योनि मुद्रा वाली, त्रिखण्डेशी, त्रिगुणाम्बा और त्रिकोणाकार हैं। आप पवित्र, अद्भुत चारित्र्य वाली और इच्छित फल देने वाली हैं।
अभ्यासाति शयज्ञाता, षडध्वातीत रूपिणी।
अव्याज करुणामूर्ति, रज्ञानध्वान्त दीपिका ॥१८१॥
अर्थ: आप अभ्यास से ज्ञानी, षडध्वातीत रूप वाली हैं। आप अव्याज करुणामूर्ति और राज्य के ज्ञान और अन्धकार का दीपक हैं।
आबालगोप विदिता, सर्वानुल्लङ्घ्य शासना।
श्री चक्रराजनिलया, श्रीमत्त्रिपुर सुन्दरी ॥१८२॥
अर्थ: आप बाल और गोपों में ज्ञात, सभी नियमों का पालन करने वाली हैं। आप श्री चक्रराज की निवासिनी और श्रीमद्द्वारा त्रिपुरा की सुंदरता हैं।
श्री शिवा, शिवशक्त्यैक्य रूपिणी, ललिताम्बिका।
एवं श्रीललितादेव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः ॥१८३॥
अर्थ: आप श्री शिवा हैं, शिव और शक्ति का ऐक्य स्वरूप और ललिताम्बिका हैं। इस प्रकार श्रीललिता देवी के हजार नाम गाए गए।
सिन्धूरारुण विग्रहां त्रिणयनां माणिक्य मौलिस्फुरत्तारानायक शेखरां स्मितमुखी मापीन वक्षोरुहाम्।
पाणिभ्या मलिपूर्ण रत्न चषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं सौम्यां रत्नघटस्थ रक्त चरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
अर्थ: आप सिंदूरारुण, त्रिनेत्रधारी, माणिक्य माला और तारा नायक शिखर वाली, स्मितमुखी, वक्षोरुह धारी हैं। आप हाथों में रत्नों से भरा चषक धारण करती हैं और लाल चरणों वाली सौम्य देवी हैं।